भक्ति से सुख मिलता है

भक्ति दिव्य प्रेम है। प्रेम ऊपर चढे तो भक्ति है
और नीचे गिरे तो आसक्ति।धृतराष्ट्र का पुत्रप्रेमआसक्तिहै
और भरत का रामप्रेमभक्ति है।
प्रीति विराट से जुडे तो वही भक्ति है।
मातृभक्ति,पितृभक्ति और देशभक्ति
 अपने स्थान पर बिल्कुल ठीक है।
यही भक्ति जब विराट की ओर उन्मुख होती है
तो उसे पराभक्ति कहते हैं।
प्रेम है मन से मन का मिलन और
भक्ति है आत्मा से आत्मा का मिलन।
साधुता बाह्य तत्त्‍‌व न होकर आंतरिक तत्त्‍‌व है।
मनुष्य सब के साथ है, किंतु अपने साथ नहीं है।
पर  उसके ही ध्यान में है, स्व नहीं।
 स्व में जागना ही साधुता है-भक्ति है।
भीतर की यह भक्ति बाहर शांति के रूप में पहचानी जाती है।


बिना भरोसे के जीवन संभव ही नहीं है।

यह मानव मनोविज्ञान है।
विकल्प केवल इतना है कि
किस पर भरोसा किया जाए?
अर्जुन को तो केवल भगवान की भक्ति
(शरणागति) में भरोसा है।
जब चित्त में प्रभु का भरोसा बढने लगे तो
समझो कि हृदय में भक्ति निरंतर बढ रही है।
जब सारे आश्रय टूटने लगते हैं तो
एक ही भरोसा भक्ति का होता है।
भगवान के प्रति निष्ठा पक्की होते ही
भक्ति पुष्ट हो जाती है।
महत्व की आनंदमयीस्वीकृति श्रद्धा है,
जो भक्ति का प्राण रस है।


यदि सामने खडा व्यक्ति महिमामण्डित है
तो उसके समक्ष झुकने में आनंद का अनुभव होता है।
श्रद्धा और प्रेम का रसमय योग ही भक्ति है।
भक्ति को व्यापार न बनने दो।
वह लेनदेन की चीज नहीं है। जब तक श्रद्धा,
प्रेम, संकल्प और ईमान में खोट है
तब तक परमात्मा की अनुकंपा नहीं मिलेगी।


भगवान् को नरलीलाकरने के लिए
जो धरती पर उतार दे, वह भक्ति है।
परमात्मा के वश में पूरी सृष्टि है,
किंतु वे स्वयं भक्तों के वश में हैं।
भक्त के वश में होकर ही उन्होंने
नामदेव का चढाया नैवेद्य खाया,
प्रहलाद के रक्षार्थ नरसिंह रूप में खंभे में प्रकट हुए
और शबरी की कुटिया में
स्वयं पधार कर दर्शन दिए।
प्रेम ऊंचा हो तो वह भक्ति है।


भक्ति धर्म, कर्म और मुक्ति से श्रेष्ठ है।
इसलिए संत को मुक्ति नहीं चाहिए, भक्ति चाहिए।
भक्ति योगी, भोगी, रोगी सभी कर सकते हैं।
घर बाहर सर्वत्र कर सकते है,
क्योंकि भक्ति अधिकार की मांग नहीं करती है।
बिना भगवत्प्रीतिके सुख नहीं मिल सकता,
क्योंकि सुख का असली स्रोत परमात्मा है।
यदि पूरा जगत भोग के लिए मिल जाए
तो भी सुख नहीं मिलता। जो जहां नहीं है
वह वहां से कैसे मिलेगा? जैसे पानी के मथने से
मक्खन नहीं मिलता वैसे जगत् के मंथन से
आनंद नहीं मिल सकता।


इस प्रकार भक्ति से सुख मिलता है
और भक्ति संत समागम से प्राप्त होती है....हरी ॐ
भगवान् को प्रिय है हरिनाम ॥
♥♥..... भगवत्प्रेममें मस्त आशु.

 

 

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